श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 48: सीता का दुःखपूर्ण वचन, श्रीराम के लिये उनका संदेश, लक्ष्मण का जाना और सीता का रोना  »  श्लोक 24-25h
 
 
श्लोक  7.48.24-25h 
मुहुर्मुहु: परावृत्य दृष्ट्वा सीतामनाथवत्॥ २४॥
चेष्टन्तीं परतीरस्थां लक्ष्मण: प्रययावथ।
 
 
अनुवाद
सीता गंगा के उस पार अनाथ की तरह रोती हुई ज़मीन पर लोट रही थीं। लक्ष्मण बार-बार उनकी ओर मुँह फेरकर चले जा रहे थे।
 
Sita was rolling on the ground on the other bank of the Ganges, weeping like an orphan. Lakshmana kept turning his face towards her and walking away. 24 1/2
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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