दृष्टपूर्वं न ते रूपं पादौ दृष्टौ तवानघे॥ २१॥
कथमत्र हि पश्याम रामेण रहितां वने।
अनुवाद
हे भोली-भाली एवं पतिव्रता स्त्री! मैंने तो पहले भी तुम्हारा सम्पूर्ण रूप नहीं देखा। मैंने तो केवल तुम्हारे चरण ही देखे हैं। फिर आज वन में श्री रामचन्द्रजी की अनुपस्थिति में मैं तुम्हें कैसे देख सकता हूँ?'
Innocent and devoted wife! I have never seen your complete form even before. I have seen only your feet. Then how can I look at you today in the absence of Shri Ramchandraji here in the forest?'