श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 48: सीता का दुःखपूर्ण वचन, श्रीराम के लिये उनका संदेश, लक्ष्मण का जाना और सीता का रोना  »  श्लोक 14-15
 
 
श्लोक  7.48.14-15 
वक्तव्यश्चैव नृपतिर्धर्मेण सुसमाहित:॥ १४॥
यथा भ्रातृषु वर्तेथास्तथा पौरेषु नित्यदा।
परमो ह्येष धर्मस्ते तस्मात् कीर्तिरनुत्तमा॥ १५॥
 
 
अनुवाद
‘लक्ष्मण! तुम राजा से कहो कि वह अत्यंत सावधानी से रहे और नगरवासियों के साथ वैसा ही व्यवहार करे जैसा वह अपने भाइयों के साथ करता है। यही तुम्हारा परम धर्म है और इसी से तुम्हें परम यश की प्राप्ति हो सकती है।॥ 14-15॥
 
‘Lakshmana! You tell the king that he should live with utmost care and behave with the people of the city in the same way as he behaves with his brothers. This is your ultimate religion and only through this can you achieve the highest fame.॥ 14-15॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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