श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 47: लक्ष्मण का सीताजी को नाव से गङ्गाजी के उस पार पहुँचाकर बड़े दुःख से उन्हें उनके त्यागे जाने की बात बताना  »  श्लोक 4
 
 
श्लोक  7.47.4 
हृद‍्गतं मे महच्छल्यं यस्मादार्येण धीमता।
अस्मिन्निमित्ते वैदेहि लोकस्य वचनीकृत:॥ ४॥
 
 
अनुवाद
विदेहनन्दिनी! मेरे हृदय में सबसे बड़ा काँटा यह है कि आज रघुनाथजी ने अत्यन्त बुद्धिमान होते हुए भी मुझे ऐसा कार्य सौंपा है, जिसके कारण संसार में मेरी बड़ी निन्दा होगी॥4॥
 
Videhanandini! The biggest thorn in my heart is that today Raghunathji, in spite of being very intelligent, has entrusted me with a task due to which I will be greatly criticized in the world. ॥ 4॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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