श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 47: लक्ष्मण का सीताजी को नाव से गङ्गाजी के उस पार पहुँचाकर बड़े दुःख से उन्हें उनके त्यागे जाने की बात बताना  »  श्लोक 16-17
 
 
श्लोक  7.47.16-17 
राज्ञो दशरथस्यैव पितुर्मे मुनिपुङ्गव:॥ १६॥
सखा परमको विप्रो वाल्मीकि: सुमहायशा:।
पादच्छायामुपागम्य सुखमस्य महात्मन:।
उपवासपरैकाग्रा वस त्वं जनकात्मजे॥ १७॥
 
 
अनुवाद
मेरे पिता राजा दशरथ के परम मित्र महर्षि वाल्मीकि यहाँ निवास करते हैं। तुम उन महात्मा के चरणों की शरण ग्रहण करो और यहाँ सुखपूर्वक रहो। हे जनकपुत्र! तुम यहाँ व्रत करो और एकाग्रचित्त होकर रहो॥ 16-17॥
 
My father King Dasharath's close friend, the great sage Valmiki, lives here. You should take shelter of the feet of that great soul and live here happily. O son of Janaka, you should fast and stay here with concentration.॥ 16-17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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