श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 47: लक्ष्मण का सीताजी को नाव से गङ्गाजी के उस पार पहुँचाकर बड़े दुःख से उन्हें उनके त्यागे जाने की बात बताना  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  7.47.15-16h 
तदेतज्जाह्नवीतीरे ब्रह्मर्षीणां तपोवनम्॥ १५॥
पुण्यं च रमणीयं च मा विषादं कृथा: शुभे।
 
 
अनुवाद
'शुभ! यह गंगा नदी के तट पर ब्रह्मऋषियों का पवित्र एवं सुन्दर आश्रम है। तुम दुःखी मत होओ।'
 
‘Shubh! This is the sacred and beautiful hermitage of the Brahmarishis on the banks of river Ganga. Do not be sad. 15 1/2.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)