श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 46: लक्ष्मण का सीता को रथ पर बिठाकर उन्हें वन में छोड़ने के लिये ले जाना और गङ्गाजी के तट पर पहुँचना  »  श्लोक 8-9h
 
 
श्लोक  7.46.8-9h 
गङ्गातीरे मया देवि ऋषीणामाश्रमान् शुभान्।
शीघ्रं गत्वा तु वैदेहि शासनात् पार्थिवस्य न:॥ ८॥
अरण्ये मुनिभिर्जुष्टे अपनेया भविष्यसि।
 
 
अनुवाद
हे विदेहनपुत्री! उस वार्तालाप के अनुसार, राजा की आज्ञा से मैं शीघ्र ही गंगा के तट पर ऋषियों के सुन्दर आश्रमों में जाकर तुम्हें ऋषियों से सेवित वन में ले जाऊँगा।' ॥8 1/2॥
 
Goddess! O daughter of Videhan! As per that conversation, by the order of the King, I shall soon go to the beautiful hermitages of the sages on the banks of the Ganges and take you to the forest served by sages.' ॥ 8 1/2 ॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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