श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 46: लक्ष्मण का सीता को रथ पर बिठाकर उन्हें वन में छोड़ने के लिये ले जाना और गङ्गाजी के तट पर पहुँचना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.46.5 
आनीयोवाच सौमित्रिं मित्राणां मानवर्धनम्।
रथोऽयं समनुप्राप्तो यत्कार्यं क्रियतां प्रभो॥ ५॥
 
 
अनुवाद
उसे लाकर उसने सुमित्रों के गौरव सुमित्रपुत्र से कहा, 'प्रभु! यह रथ आ गया है। अब जो कुछ करना हो, करो।'॥5॥
 
Having brought it, he said to the son of Sumitra, who is the pride of friends, 'Prabhu! This chariot has arrived. Now do whatever you want to do.'॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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