श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 46: लक्ष्मण का सीता को रथ पर बिठाकर उन्हें वन में छोड़ने के लिये ले जाना और गङ्गाजी के तट पर पहुँचना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  7.46.32 
तस्यास्तद् वचनं श्रुत्वा प्रमृज्य नयने शुभे।
नाविकानाह्वयामास लक्ष्मण: परवीरहा।
इयं स सज्जा नौश्चेति दाशा: प्राञ्जलयोऽब्रुवन्॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
सीताजी के ये वचन सुनकर शत्रुवीरों का संहार करने वाले लक्ष्मण ने अपने दोनों सुन्दर नेत्र पोंछकर केवटों को बुलाया। उन केवटों ने हाथ जोड़कर कहा, 'प्रभु! यह नाव तैयार है।'
 
On hearing these words of Sitaji, Lakshmana, the slayer of enemy warriors, wiped his two beautiful eyes and called the boatmen. Those boatmen folded their hands and said, 'Prabhu! This boat is ready.'
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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