श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 46: लक्ष्मण का सीता को रथ पर बिठाकर उन्हें वन में छोड़ने के लिये ले जाना और गङ्गाजी के तट पर पहुँचना  »  श्लोक 31
 
 
श्लोक  7.46.31 
ममापि पद्मपत्राक्षं सिंहोरस्कं कृशोदरम्।
त्वरते हि मनो द्रष्टुं रामं रमयतां वरम्॥ ३१॥
 
 
अनुवाद
मेरा मन भी श्री रामजी के दर्शन के लिए उत्सुक है, जिनका वक्षस्थल सिंह के समान, उदर पतला और नेत्र कमल के समान हैं तथा जो मन को प्रसन्न करने वालों में श्रेष्ठ हैं।॥31॥
 
My mind too is eager to see Sri Rama, who has a chest like that of a lion, a slender abdomen and eyes like lotus and who is the best among those who delight the mind.'॥ 31॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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