श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 46: लक्ष्मण का सीता को रथ पर बिठाकर उन्हें वन में छोड़ने के लिये ले जाना और गङ्गाजी के तट पर पहुँचना  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  7.46.25-26 
सीता तु परमायत्ता दृष्ट्वा लक्ष्मणमातुरम्।
उवाच वाक्यं धर्मज्ञा किमिदं रुद्यते त्वया॥ २५॥
जाह्नवीतीरमासाद्य चिराभिलषितं मम।
हर्षकाले किमर्थं मां विषादयसि लक्ष्मण॥ २६॥
 
 
अनुवाद
लक्ष्मण को शोक से आकुल देखकर धर्म जानने वाली सीता अत्यन्त चिन्तित होकर उनसे बोलीं- 'लक्ष्मण! यह क्या है? तुम क्यों रो रहे हो? गंगा तट पर आकर मेरी चिरकाल की अभिलाषा पूर्ण हो गई है। इस हर्ष के समय तुम रो-रोकर मुझे क्यों दुःखी कर रहे हो?॥ 25-26॥
 
Seeing Lakshmana overwhelmed with grief, Sita, who knew Dharma, became very worried and said to him- 'Laxmana! What is this? Why are you crying? By coming to the banks of the Ganga, my long-standing desire has been fulfilled. Why are you making me sad by crying at this time of joy?॥ 25-26॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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