|
| |
| |
श्लोक 7.45.24-25  |
एवमुक्त्वा तु काकुत्स्थो बाष्पेण पिहितेक्षण:॥ २४॥
संविवेश स धर्मात्मा भ्रातृभि: परिवारित:।
शोकसंविग्नहृदयो निशश्वास यथा द्विप:॥ २५॥ |
| |
| |
| अनुवाद |
| ऐसा कहते हुए श्री रघुनाथजी के दोनों नेत्र आँसुओं से भर गए। तब धर्मात्मा श्री राम अपने भाइयों के साथ महल में गए। उस समय उनका हृदय शोक से व्याकुल था और वे हाथी के समान गहरी साँसें ले रहे थे। |
| |
| While saying this, both the eyes of Shri Raghunathji were filled with tears. Then the virtuous Shri Ram went to the palace with his brothers. At that time his heart was upset with grief and he was breathing deeply like an elephant. 24-25. |
| |
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे पञ्चचत्वारिंश: सर्ग: ॥ ४ ५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पैंतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ४ ५॥ |
| |
| ✨ ai-generated |
| |
|