श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 45: श्रीराम का भाइयों के समक्ष सर्वत्र फैले हुए लोकापवाद की चर्चा करके सीता को वन में छोड़ आने के लिये लक्ष्मण को आदेश देना  »  श्लोक 21-22h
 
 
श्लोक  7.45.21-22h 
शापिता हि मया यूयं पादाभ्यां जीवितेन च।
ये मां वाक्यान्तरे ब्रूयुरनुनेतुं कथंचन॥ २१॥
अहिता नाम ते नित्यं मदभीष्टविघातनात्।
 
 
अनुवाद
‘मैं तुम्हें अपने चरणों और प्राणों की शपथ देकर कहता हूँ, मेरे निर्णय के विरुद्ध कुछ मत कहना। जो लोग मेरे इस कथन के बीच में आकर मुझे समझाने के लिए कुछ कहेंगे, वे सदा के लिए मेरे शत्रु हो जाएँगे, क्योंकि वे मेरे इच्छित कार्य में बाधा डालेंगे।’ 21 1/2.
 
‘I swear to you by my feet and life, do not say anything against my decision. Those who jump in the middle of this statement of mine and say something to persuade me, they will be my enemies forever because they will obstruct my desired work. 21 1/2.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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