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श्लोक 7.45.18-19  |
तत्रैतां विजने देशे विसृज्य रघुनन्दन॥ १८॥
शीघ्रमागच्छ सौमित्रे कुरुष्व वचनं मम।
न चास्मि प्रतिवक्तव्य: सीतां प्रति कथंचन॥ १९॥ |
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| अनुवाद |
| 'रघुनन्दन! सीता को उस आश्रम के निकट निर्जन वन में छोड़कर शीघ्र ही लौट आओ। सुमित्रानन्दन! मेरी इस आज्ञा का पालन करो। सीता के विषय में तुम मुझसे और कुछ न कहना।॥18-19॥ |
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| ‘Raghunandan! Leave Sita in the deserted forest near that ashram and return soon. Sumitraanandan! Follow this order of mine. You should not tell me anything else about Sita.॥ 18-19॥ |
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