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श्लोक 7.45.14-15h  |
अप्यहं जीवितं जह्यां युष्मान् वा पुरुषर्षभा:॥ १४॥
अपवादभयाद् भीत: किं पुनर्जनकात्मजाम्। |
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| अनुवाद |
| हे पुरुषश्रेष्ठ! मैं लोकनिंदा के भय से अपने और आप सबके प्राण त्याग सकता हूँ। फिर सीता को त्यागने में क्या बड़ी बात है?॥14 1/2॥ |
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| ‘O best of men! I can give up my life and all of you out of fear of public condemnation. Then what is the big deal in giving up Sita?॥ 14 1/2॥ |
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