श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 45: श्रीराम का भाइयों के समक्ष सर्वत्र फैले हुए लोकापवाद की चर्चा करके सीता को वन में छोड़ आने के लिये लक्ष्मण को आदेश देना  »  श्लोक 10-11h
 
 
श्लोक  7.45.10-11h 
अन्तरात्मा च मे वेत्ति सीतां शुद्धां यशस्विनीम्॥ १०॥
ततो गृहीत्वा वैदेहीमयोध्यामहमागत:।
 
 
अनुवाद
मेरा अन्तःकरण भी महिमामयी सीता को पवित्र मानता है। इसीलिए मैं इस विदेहपुत्री को अपने साथ अयोध्या ले आया हूँ॥ 10 1/2॥
 
‘My conscience also considers the glorious Sita to be pure. That is why I brought this daughter of Videha along with me to Ayodhya.॥ 10 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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