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ramayan 7.44.1: अपने मित्रों से विदा लेकर श्री रघुनाथजी ने सोच-विचारकर अपना कर्तव्य निश्चित किया और पास खड़े द्वारपाल से इस प्रकार कहा-॥1॥   |   ramayan सर्ग 7.44: श्रीराम के बुलाने से सब भाइयों का उनके पास आना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 44: श्रीराम के बुलाने से सब भाइयों का उनके पास आना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  7.44.1 
विसृज्य तु सुहृद्वर्गं बुद्धॺा निश्चित्य राघव:।
समीपे द्वा:स्थमासीनमिदं वचनमब्रवीत्॥ १॥
 
 
अनुवाद
अपने मित्रों से विदा लेकर श्री रघुनाथजी ने सोच-विचारकर अपना कर्तव्य निश्चित किया और पास खड़े द्वारपाल से इस प्रकार कहा-॥1॥
 
After bidding farewell to his friends, Sri Raghunatha decided on his duty after thinking carefully and said this to the nearby gatekeeper -॥ 1॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)