Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 ramayan 7.42.32-35h: इस पर सीताजी ने मुस्कुराकर श्री रामचन्द्रजी से कहा - 'रघुनन्दन! मैं एक बार उन पवित्र आश्रमों को देखना चाहती हूँ। हे प्रभु! मैं उन उग्र एवं तेजस्वी महर्षियों के पास (कुछ दिन) रहना चाहती हूँ, जो गंगाजी के तट पर निवास करते हैं और फल-मूल खाते हैं। हे ककुत्स्थ! मैं उन फल-मूल खाने वाले महात्माओं के आश्रम में एक रात निवास करना चाहती हूँ, इस समय यही मेरी सबसे बड़ी इच्छा है।' | ramayan सर्ग 7.42: अशोकवनिका में श्रीराम और सीता का विहार, गर्भिणी सीता का तपोवन देखने की इच्छा प्रकट करना और श्रीराम का इसके लिये स्वीकृति देना । ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड । श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
इस पर सीताजी ने मुस्कुराकर श्री रामचन्द्रजी से कहा - 'रघुनन्दन! मैं एक बार उन पवित्र आश्रमों को देखना चाहती हूँ। हे प्रभु! मैं उन उग्र एवं तेजस्वी महर्षियों के पास (कुछ दिन) रहना चाहती हूँ, जो गंगाजी के तट पर निवास करते हैं और फल-मूल खाते हैं। हे ककुत्स्थ! मैं उन फल-मूल खाने वाले महात्माओं के आश्रम में एक रात निवास करना चाहती हूँ, इस समय यही मेरी सबसे बड़ी इच्छा है।'
On this Sitaji smiled and said to Shri Ramchandraji - 'Raghunandan! I wish to see those holy hermitages once. O God! I wish to stay (for a few days) near those fierce and brilliant Maharshis who live on the banks of Ganga and eat fruits and roots. O Kakutstha! I wish to stay for one night in the hermitage of the great souls who eat fruits and roots, this is my biggest desire at this time.'
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥