श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 42: अशोकवनिका में श्रीराम और सीता का विहार, गर्भिणी सीता का तपोवन देखने की इच्छा प्रकट करना और श्रीराम का इसके लिये स्वीकृति देना  »  श्लोक 25-26
 
 
श्लोक  7.42.25-26 
तथा तयोर्विहरतो: सीताराघवयोश्चिरम्॥ २५॥
अत्यक्रामच्छुभ: काल: शैशिरो भोगद: सदा।
प्राप्तयोर्विविधान् भोगानतीत: शिशिरागम:॥ २६॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार सीता और रघुनाथजी बहुत समय तक इस प्रकार रहे। इस बीच शीतकाल का वह सुन्दर समय बीत गया, जो सदैव सुख प्रदान करने वाला होता है। वह शीतकाल राज दम्पति के लिए नाना प्रकार के सुखों का उपभोग करते हुए बीत गया।
 
In this manner Sita and Raghunathji continued to live for a long time. In the meantime the beautiful time of winter which always provides pleasures passed by. That winter season passed by while enjoying various kinds of pleasures for the royal couple.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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