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श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 42: अशोकवनिका में श्रीराम और सीता का विहार, गर्भिणी सीता का तपोवन देखने की इच्छा प्रकट करना और श्रीराम का इसके लिये स्वीकृति देना  »  श्लोक 23-24h
 
 
श्लोक  7.42.23-24h 
स तया सीतया सार्धमासीनो विरराज ह॥ २३॥
अरुन्धत्या इवासीनो वसिष्ठ इव तेजसा।
 
 
अनुवाद
उस समय सीतादेवी के साथ सिंहासन पर बैठे हुए भगवान श्री राम अपनी शोभा से ऐसे ही शोभायमान हो रहे थे, जैसे अरुन्धती के साथ बैठे हुए वसिष्ठजी। 23 1/2॥
 
At that time, Lord Shri Ram, sitting on the throne with Sita Devi, looked as beautiful in his glory as Vasisthaji sitting with Arundhati. 23 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)