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ramayan 7.42.22-23h: दूसरों को प्रसन्न करने वाले पुरुषों में श्रेष्ठ धर्मात्मा श्री रामजी उत्तम वस्त्राभूषणों से विभूषित उन सुन्दर स्त्रियों को दान आदि देकर सदैव संतुष्ट रखते थे॥22 1/2॥   |   ramayan सर्ग 7.42: अशोकवनिका में श्रीराम और सीता का विहार, गर्भिणी सीता का तपोवन देखने की इच्छा प्रकट करना और श्रीराम का इसके लिये स्वीकृति देना   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 42: अशोकवनिका में श्रीराम और सीता का विहार, गर्भिणी सीता का तपोवन देखने की इच्छा प्रकट करना और श्रीराम का इसके लिये स्वीकृति देना  »  श्लोक 22-23h
 
 
श्लोक  7.42.22-23h 
मनोऽभिरामा रामास्ता रामो रमयतां वर:॥ २२॥
रमयामास धर्मात्मा नित्यं परमभूषिता:।
 
 
अनुवाद
दूसरों को प्रसन्न करने वाले पुरुषों में श्रेष्ठ धर्मात्मा श्री रामजी उत्तम वस्त्राभूषणों से विभूषित उन सुन्दर स्त्रियों को दान आदि देकर सदैव संतुष्ट रखते थे॥22 1/2॥
 
Shri Ram, the best religious soul among the men who pleased others, always kept those lovely ladies adorned with the best clothes and ornaments satisfied by giving them gifts etc. 22 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)