श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 42: अशोकवनिका में श्रीराम और सीता का विहार, गर्भिणी सीता का तपोवन देखने की इच्छा प्रकट करना और श्रीराम का इसके लिये स्वीकृति देना  »  श्लोक 18-19h
 
 
श्लोक  7.42.18-19h 
सीतामादाय हस्तेन मधु मैरेयकं शुचि॥ १८॥
पाययामास काकुत्स्थ: शचीमिव पुरंदर:।
 
 
अनुवाद
जिस प्रकार भगवान इन्द्र शची को अमृत पिलाते हैं, उसी प्रकार ककुत्स्थ कुल के रत्न भगवान राम ने अपने हाथों से मधु का पवित्र पेय लेकर सीता को पिलाया।
 
Just as Lord Indra makes Shachi drink nectar, in the same way Lord Rama, the jewel of the Kakutstha clan, took the sacred drink of honey with his hands and made Sita drink it. 18 1/2
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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