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ramayan 7.41.14-15h: और उन्होंने कहा, 'अब तुम जाओ। जब मैं तुम्हारा स्मरण करूँ, तब लौट आना। आकाश में रहो और मेरे वियोग से अपने को दुःखी मत होने दो (मैं समयानुसार तुम्हारा उपयोग करता रहूँगा)। अपनी इच्छा से सब दिशाओं में जाते हुए तुम किसी से टकराओ नहीं और न ही तुम्हारी गति में कहीं बाधा आए।'॥14 1/2॥   |   ramayan सर्ग 7.41: कुबेर के भेजे हुए पुष्पकविमान का आना और श्रीराम से पूजित एवं अनुगृहीत होकर अदृश्य हो जाना, भरत के द्वारा श्रीरामराज्य के विलक्षण प्रभाव का वर्णन   ।   ramayan काण्ड 7: उत्तर काण्ड   ।   श्रीमद् वाल्मीकि रामायण Srimad Valmiki Ramayana | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 41: कुबेर के भेजे हुए पुष्पकविमान का आना और श्रीराम से पूजित एवं अनुगृहीत होकर अदृश्य हो जाना, भरत के द्वारा श्रीरामराज्य के विलक्षण प्रभाव का वर्णन  »  श्लोक 14-15h
 
 
श्लोक  7.41.14-15h 
गम्यतामिति चोवाच आगच्छ त्वं स्मरे यदा।
सिद्धानां च गतौ सौम्य मा विषादेन योजय॥ १४॥
प्रतिघातश्च ते मा भूद् यथेष्टं गच्छतो दिश:।
 
 
अनुवाद
और उन्होंने कहा, 'अब तुम जाओ। जब मैं तुम्हारा स्मरण करूँ, तब लौट आना। आकाश में रहो और मेरे वियोग से अपने को दुःखी मत होने दो (मैं समयानुसार तुम्हारा उपयोग करता रहूँगा)। अपनी इच्छा से सब दिशाओं में जाते हुए तुम किसी से टकराओ नहीं और न ही तुम्हारी गति में कहीं बाधा आए।'॥14 1/2॥
 
And he said, 'Now you go. Come back when I remember you. Stay in the sky and do not let yourself be saddened by my separation (I will keep using you as per the time). While going in all directions at your own will, you should not collide with anyone or your speed should not be obstructed anywhere.'॥ 14 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)