| श्रीमद् वाल्मीकि रामायण » काण्ड 7: उत्तर काण्ड » सर्ग 4: रावण आदि का जन्म और उनका तप के लिये गोकर्ण - आश्रम में जाना » श्लोक 8 |
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| | | | श्लोक 7.4.8  | राघवस्य वच: श्रुत्वा संस्कारालंकृतं शुभम्।
अथ विस्मयमानस्तमगस्त्य: प्राह राघवम्॥ ८॥ | | | | | | अनुवाद | | श्री रघुनाथजी की वह सुन्दर वाणी शब्दों, वाक्यों और अर्थों के उच्चारण से सुशोभित थी। उसे सुनकर अगस्त्यजी यह सोचकर आश्चर्यचकित हुए कि यह सर्वज्ञ होकर भी मुझसे इस प्रकार पूछ रहा है, मानो मैं अज्ञानी हूँ। तत्पश्चात् उन्होंने श्री राम से कहा-॥8॥ | | | | That beautiful speech of Shri Raghunathji was adorned with the pronunciation of words, sentences and meaning. Hearing it, Agastyaji was surprised thinking that despite being omniscient, he is asking me as if I am ignorant. After that he said to Shri Ram -॥ 8॥ | | ✨ ai-generated | | |
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