श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 4: रावण आदि का जन्म और उनका तप के लिये गोकर्ण - आश्रम में जाना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  7.4.32 
तत: सुकेशो वरदानगर्वित:
श्रियं प्रभो: प्राप्य हरस्य पार्श्वत:।
चचार सर्वत्र महान् महामति:
खगं पुरं प्राप्य पुरंदरो यथा॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
वह विद्युत्-पुत्र सुकेश नाम से प्रसिद्ध हुआ। वह बड़ा बुद्धिमान था। भगवान शंकर का वरदान पाकर वह बड़ा अभिमानी हो गया और उनसे अद्भुत धन तथा दिव्य विमान पाकर वह देवराज इन्द्र के समान सर्वत्र विचरण करने लगा। 32॥
 
That son of the electrician became famous by the name of Sukesh. He was very intelligent. He became very proud after receiving the boon of Lord Shankar and after getting amazing wealth and a celestial plane from that God, he started roaming everywhere like Devraj Indra. 32॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे चतुर्थ: सर्ग: ॥ ४ ॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें चौथा सर्ग पूरा हुआ ॥ ४ ॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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