श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 4: रावण आदि का जन्म और उनका तप के लिये गोकर्ण - आश्रम में जाना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  7.4.1 
श्रुत्वागस्त्येरितं वाक्यं रामो विस्मयमागत:।
कथमासीत् तु लङ्कायां सम्भवो रक्षसां पुरा॥ १॥
 
 
अनुवाद
अगस्त्य जी की यह बात सुनकर श्री रामचंद्रजी को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने मन ही मन सोचा, राक्षस कुल की उत्पत्ति तो विश्रवा ऋषि से मानी जाती है। यदि उनसे पहले भी लंकापुरी में राक्षस रहते थे, तो उनकी उत्पत्ति कैसे हुई?
 
Hearing this statement of Agastya, Shri Ramchandraji was very surprised. He thought to himself, the origin of the demon clan is believed to be from sage Vishravas. If demons lived in Lankapuri even before him, then how did they originate?
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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