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श्लोक 7.39.29-30  |
एवं तेषां ययौ मासो द्वितीय: शिशिर: सुखम्।
वानराणां प्रहृष्टानां राक्षसानां च सर्वश:॥ २९॥
इक्ष्वाकुनगरे रम्ये परां प्रीतिमुपासताम्।
रामस्य प्रीतिकरणै: कालस्तेषां सुखं ययौ॥ ३०॥ |
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| अनुवाद |
| इस प्रकार शीतकाल का दूसरा महीना भी सुखपूर्वक बीत गया। इक्ष्वाकुवंश के राजाओं की उस सुन्दर राजधानी में वे वानर और राक्षस सुखपूर्वक और प्रेमपूर्वक रहने लगे। श्री राम के प्रेमपूर्ण आतिथ्य के कारण वह समय उनके लिए सुखपूर्वक बीत रहा था। |
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| In this way the second month of winter also passed happily. In that beautiful capital of the kings of Ikshvaku dynasty those monkeys and demons lived happily and with love. Due to the loving hospitality of Shri Ram that time was passing happily for them. |
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इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे एकोनचत्वारिंश: सर्ग: ॥ ३ ९॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें उनतालीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३ ९॥ |
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