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श्लोक 7.36.59  |
अहं युष्मान् समाश्रित्य तपोनिर्धूतकल्मषान्।
अनुगृहीत: पितृभिर्भविष्यामि सुनिर्वृत:॥ ५९॥ |
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| अनुवाद |
| ‘आप अपनी तपस्या से निष्पाप हो गए हैं। आपकी शरण में आकर मैं सदैव संतुष्ट रहूँगा और मेरे पितरों का आशीर्वाद मुझ पर बना रहेगा ॥59॥ |
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| ‘You have become sinless by your penance. By taking shelter of you, I will always be satisfied and will be blessed by my ancestors. ॥ 59॥ |
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