श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 36: ब्रह्मा आदि देवताओं का हनुमान्जी को जीवित करके नाना प्रकारके वरदान देना और वायु का उन्हें लेकर अञ्जना के घर जाना, ऋषियों के शाप से हनुमान्जी को अपने बल की विस्मृति, श्रीराम का अगस्त्य आदि ऋषियों से अपने यज्ञ में पधारने के लिये प्रस्ताव करके उन्हें विदा देना  »  श्लोक 59
 
 
श्लोक  7.36.59 
अहं युष्मान् समाश्रित्य तपोनिर्धूतकल्मषान्।
अनुगृहीत: पितृभिर्भविष्यामि सुनिर्वृत:॥ ५९॥
 
 
अनुवाद
‘आप अपनी तपस्या से निष्पाप हो गए हैं। आपकी शरण में आकर मैं सदैव संतुष्ट रहूँगा और मेरे पितरों का आशीर्वाद मुझ पर बना रहेगा ॥59॥
 
‘You have become sinless by your penance. By taking shelter of you, I will always be satisfied and will be blessed by my ancestors. ॥ 59॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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