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श्लोक 7.36.58  |
सदस्या मम यज्ञेषु भवन्तो नित्यमेव तु।
भविष्यथ महावीर्या ममानुग्रहकांक्षिण:॥ ५८॥ |
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| अनुवाद |
| हे महान् एवं शक्तिशाली महात्मा, आप मुझ पर कृपा करने के लिए मेरे उन यज्ञों में नियमित रूप से भाग लेते रहें॥ 58॥ |
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| You, that great and powerful Mahatma, should remain a regular participant in those yagyas of mine to bestow your favour on me.॥ 58॥ |
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