श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 36: ब्रह्मा आदि देवताओं का हनुमान्जी को जीवित करके नाना प्रकारके वरदान देना और वायु का उन्हें लेकर अञ्जना के घर जाना, ऋषियों के शाप से हनुमान्जी को अपने बल की विस्मृति, श्रीराम का अगस्त्य आदि ऋषियों से अपने यज्ञ में पधारने के लिये प्रस्ताव करके उन्हें विदा देना  »  श्लोक 55
 
 
श्लोक  7.36.55 
अद्य मे देवतास्तुष्टा: पितर: प्रपितामहा:।
युष्माकं दर्शनादेव नित्यं तुष्टा: सबान्धवा:॥ ५५॥
 
 
अनुवाद
मुनीश्वर! आज देवता, पितर और पितामह आदि मुझ पर विशेष रूप से संतुष्ट हैं। आप जैसे महात्माओं के दर्शन से हम लोग, बन्धु-बान्धवों सहित, सदैव संतुष्ट रहते हैं। 55॥
 
Munishwar! Today the gods, ancestors and grandfathers etc. are especially satisfied with me. We, along with our friends and relatives, are always satisfied with the darshan of great souls like you. 55॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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