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श्लोक 7.36.53  |
अगस्त्यस्त्वब्रवीद् रामं सर्वमेतच्छ्रुतं त्वया।
दृष्ट: सम्भाषितश्चासि राम गच्छामहे वयम्॥ ५३॥ |
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| अनुवाद |
| तत्पश्चात् अगस्त्यजी ने श्री रामचन्द्रजी से कहा - 'योगियों के हृदय में निवास करने वाले श्री राम! आपने यह सम्पूर्ण वृत्तान्त सुन लिया है। हमने आपको देखा है और आपसे बातचीत की है। इसलिए अब हम यहाँ से जा रहे हैं।'॥ 53॥ |
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| Thereafter Agastya said to Shri Ramchandraji - 'Shri Ram who resides in the hearts of yogis! You have heard this entire episode. We have seen you and talked with you. That is why we are leaving now.'॥ 53॥ |
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