श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 36: ब्रह्मा आदि देवताओं का हनुमान्जी को जीवित करके नाना प्रकारके वरदान देना और वायु का उन्हें लेकर अञ्जना के घर जाना, ऋषियों के शाप से हनुमान्जी को अपने बल की विस्मृति, श्रीराम का अगस्त्य आदि ऋषियों से अपने यज्ञ में पधारने के लिये प्रस्ताव करके उन्हें विदा देना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.36.5 
प्राणवन्तमिमं दृष्ट्वा प्राणो गन्धवहो मुदा।
चचार सर्वभूतेषु संनिरुद्धं यथा पुरा॥ ५॥
 
 
अनुवाद
हनुमानजी को जीवित होते देख जगत के प्राण रूप गण्डवाहन वायुदेव पहले की भाँति समस्त प्राणियों के भीतर अवरुद्ध हुए प्राणों को प्रसन्नतापूर्वक प्रवाहित करने लगे॥5॥
 
Seeing Hanuman coming alive, Gandvahan Vayudev, the life form of the world, started happily circulating the life that was blocked within all the living beings as before. 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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