श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 36: ब्रह्मा आदि देवताओं का हनुमान्जी को जीवित करके नाना प्रकारके वरदान देना और वायु का उन्हें लेकर अञ्जना के घर जाना, ऋषियों के शाप से हनुमान्जी को अपने बल की विस्मृति, श्रीराम का अगस्त्य आदि ऋषियों से अपने यज्ञ में पधारने के लिये प्रस्ताव करके उन्हें विदा देना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  7.36.47 
सर्वासु विद्यासु तपोविधाने
प्रस्पर्धतेऽयं हि गुरुं सुराणाम्।
सोऽयं नवव्याकरणार्थवेत्ता
ब्रह्मा भविष्यत्यपि ते प्रसादात्॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
ये देवगुरु समस्त विद्याओं के ज्ञान और तप के अनुष्ठानों में बृहस्पति के समान हैं। आपकी कृपा से नवीन व्याकरण के सिद्धांतों को जानने वाले ये हनुमान जी साक्षात् ब्रह्मा के समान प्रतिष्ठित होंगे। 47॥
 
This Devguru is equal to Brihaspati in the knowledge of all the sciences and in the rituals of penance. By your grace, this Hanuman ji who knows the principles of new grammars will be respected like Brahma in person. 47॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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