श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 36: ब्रह्मा आदि देवताओं का हनुमान्जी को जीवित करके नाना प्रकारके वरदान देना और वायु का उन्हें लेकर अञ्जना के घर जाना, ऋषियों के शाप से हनुमान्जी को अपने बल की विस्मृति, श्रीराम का अगस्त्य आदि ऋषियों से अपने यज्ञ में पधारने के लिये प्रस्ताव करके उन्हें विदा देना  »  श्लोक 45
 
 
श्लोक  7.36.45 
असौ पुनर्व्याकरणं ग्रहीष्यन्
सूर्योन्मुख: प्रष्टुमना: कपीन्द्र:।
उद्यद‍‍्गिरेस्तगिरिं जगाम
ग्रन्थं महद्धारयनप्रमेय:॥ ४५॥
 
 
अनुवाद
ये अनन्त पराक्रमी हनुमान सूर्योदय से सूर्यास्त तक सूर्य की ओर मुख करके बड़े-बड़े ग्रंथ सामने रखकर व्याकरण का अध्ययन और शंका पूछने के लिए घूमते रहते थे। 45॥
 
This infinitely powerful Hanuman used to go from sunrise to sunset carrying great books in front of him with his face towards the sun to study grammar and ask doubts. 45॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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