श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 36: ब्रह्मा आदि देवताओं का हनुमान्जी को जीवित करके नाना प्रकारके वरदान देना और वायु का उन्हें लेकर अञ्जना के घर जाना, ऋषियों के शाप से हनुमान्जी को अपने बल की विस्मृति, श्रीराम का अगस्त्य आदि ऋषियों से अपने यज्ञ में पधारने के लिये प्रस्ताव करके उन्हें विदा देना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  7.36.44 
पराक्रमोत्साहमतिप्रताप-
सौशील्यमाधुर्यनयानयैश्च।
गाम्भीर्यचातुर्यसुवीर्यधैर्यै-
र्हनूमत: कोऽप्यधिकोऽस्ति लोके॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
संसार में ऐसा कौन है जो वीरता, उत्साह, बुद्धि, प्रताप, मधुरता, उचित-अनुचित का विवेक, गम्भीरता, चतुराई, उत्तम बल और धैर्य में हनुमान जी से बढ़कर है॥44॥
 
Who is there in the world who is greater than Hanuman ji in terms of bravery, enthusiasm, intelligence, majesty, amiability, sweetness, discrimination between right and wrong, seriousness, cleverness, excellent strength and patience. 44॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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