एष शापवशादेव न वेद बलमात्मन:।
वालिसुग्रीवयोर्वैरं यदा राम समुत्थितम्॥ ४१॥
न ह्येष राम सुग्रीवो भ्राम्यमाणोऽपि वालिना।
देव जानाति न ह्येष बलमात्मनि मारुति:॥ ४२॥
अनुवाद
श्री राम! फिर जब वालि और सुग्रीव में शत्रुता उत्पन्न हो गई, तब शाप के कारण हनुमान जी उसके बल को नहीं जान सके। हे प्रभु! वालि के भय से भटकने पर भी न तो सुग्रीव को अपने बल का स्मरण रहा और न स्वयं पवनकुमार ही उसके बल को जान सके॥41-42॥
Shri Ram! Then when enmity arose between Vali and Sugreeva, Hanuman ji could not know his strength due to the curse. O God! Even after wandering in fear of Vali, neither Sugreeva remembered his strength nor Pawankumar himself could know his strength. ॥ 41-42॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥