श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 36: ब्रह्मा आदि देवताओं का हनुमान्जी को जीवित करके नाना प्रकारके वरदान देना और वायु का उन्हें लेकर अञ्जना के घर जाना, ऋषियों के शाप से हनुमान्जी को अपने बल की विस्मृति, श्रीराम का अगस्त्य आदि ऋषियों से अपने यज्ञ में पधारने के लिये प्रस्ताव करके उन्हें विदा देना  »  श्लोक 40
 
 
श्लोक  7.36.40 
सुग्रीवेण समं त्वस्य अद्वैधं छिद्रवर्जितम्।
आबाल्यं सख्यमभवदनिलस्याग्निना यथा॥ ४०॥
 
 
अनुवाद
जैसे वायु की अग्नि के साथ स्वाभाविक मित्रता है, वैसे ही बालि की सुग्रीव के साथ बचपन से ही मित्रता थी। उन दोनों में कोई भेदभाव नहीं था। उनमें अटूट प्रेम था ॥40॥
 
Just like Vayu has a natural friendship with Agni, similarly Vali had a friendship with Sugreeva since childhood. There was no discrimination between them. They had unbreakable love. ॥ 40॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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