श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 36: ब्रह्मा आदि देवताओं का हनुमान्जी को जीवित करके नाना प्रकारके वरदान देना और वायु का उन्हें लेकर अञ्जना के घर जाना, ऋषियों के शाप से हनुमान्जी को अपने बल की विस्मृति, श्रीराम का अगस्त्य आदि ऋषियों से अपने यज्ञ में पधारने के लिये प्रस्ताव करके उन्हें विदा देना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  7.36.30 
स्रुग्भाण्डान्यग्निहोत्राणि वल्कलानां च संचयान्।
भग्नविच्छिन्नविध्वस्तान् संशान्तानां करोत्ययम्॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
वे शान्त महात्माओं के यज्ञ के पात्र तोड़ डालते थे, अग्निहोत्र के स्रुक, स्रुव आदि को तोड़ डालते थे और ढेर में रखे हुए वल्कलों को टुकड़े-टुकड़े कर देते थे ॥30॥
 
They used to break the utensils used for the yagya of the peaceful Mahatmas, break the sruk, sruva etc. used for the Agnihotra and tear into pieces the vulkas kept in heaps. 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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