श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 36: ब्रह्मा आदि देवताओं का हनुमान्जी को जीवित करके नाना प्रकारके वरदान देना और वायु का उन्हें लेकर अञ्जना के घर जाना, ऋषियों के शाप से हनुमान्जी को अपने बल की विस्मृति, श्रीराम का अगस्त्य आदि ऋषियों से अपने यज्ञ में पधारने के लिये प्रस्ताव करके उन्हें विदा देना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  7.36.3 
तं तु वेदविदा तेन लम्बाभरणशोभिना।
वायुमुत्थाप्य हस्तेन शिशुं तं परिमृष्टवान्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वेदों के ज्ञाता ब्रह्मा ने अपने लम्बे, फैले हुए और अलंकृत हाथों से वायुदेव को उठाया और अपने शिशु को भी सहलाया॥3॥
 
‘Brahma, the knower of Vedas, raised the Vayu deity with his long, outstretched and ornamented hands and also stroked his child.॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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