श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 36: ब्रह्मा आदि देवताओं का हनुमान्जी को जीवित करके नाना प्रकारके वरदान देना और वायु का उन्हें लेकर अञ्जना के घर जाना, ऋषियों के शाप से हनुमान्जी को अपने बल की विस्मृति, श्रीराम का अगस्त्य आदि ऋषियों से अपने यज्ञ में पधारने के लिये प्रस्ताव करके उन्हें विदा देना  »  श्लोक 12
 
 
श्लोक  7.36.12 
अहमस्य प्रदास्यामि परमं वरमद्भुतम्।
इत: प्रभृति वज्रस्य ममावध्यो भविष्यति॥ १२॥
 
 
अनुवाद
इसके अतिरिक्त मैं उसे एक और अद्भुत वर देता हूँ कि आज से वह मेरे वज्र से भी नहीं मारा जाएगा।॥12॥
 
Apart from this I give him another wonderful boon that from today onwards he will not be killed even by my thunderbolt.'॥ 12॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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