श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 36: ब्रह्मा आदि देवताओं का हनुमान्जी को जीवित करके नाना प्रकारके वरदान देना और वायु का उन्हें लेकर अञ्जना के घर जाना, ऋषियों के शाप से हनुमान्जी को अपने बल की विस्मृति, श्रीराम का अगस्त्य आदि ऋषियों से अपने यज्ञ में पधारने के लिये प्रस्ताव करके उन्हें विदा देना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  7.36.10 
तत: सहस्रनयन: प्रीतियुक्त: शुभानन:।
कुशेशयमयीं मालामुत्क्षेप्येदं वचोऽब्रवीत् ॥ १ ०॥
 
 
अनुवाद
तब सुन्दर मुख और हजार नेत्रों वाले इन्द्र ने बड़ी प्रसन्नता के साथ बालक हनुमान् के गले में कमलों की माला पहना दी और इस प्रकार कहा - ॥10॥
 
Then the beautiful faced and thousand eyed Indra placed a garland of lotuses around the neck of the child Hanuman with great pleasure and said this - ॥10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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