श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना  »  श्लोक 65
 
 
श्लोक  7.35.65 
ततोऽर्कवैश्वानरकाञ्चनप्रभं
सुतं तदोत्सङ्गगतं सदागते:।
चतुर्मुखो वीक्ष्य कृपामथाकरोत्
सदेवगन्धर्वर्षियक्षराक्षसै:॥ ६५॥
 
 
अनुवाद
तदनन्तर चतुर्मुख ब्रह्माजी देवताओं, गन्धर्वों, ऋषियों और यक्षों के साथ वहाँ पहुँचे और अपने पुत्र को वायुदेवता की गोद में सोते हुए देखा, जिसके शरीर की कांति सूर्य, अग्नि और सुवर्ण के समान चमक रही थी। उसकी यह दशा देखकर ब्रह्माजी को उस पर बड़ी दया आई॥65॥
 
After that, four-faced Brahmaji reached there along with the gods, Gandharvas, sages and Yakshas and saw his son sleeping in the lap of the Vayudevta, whose body glow was shining like the sun, fire and gold. Seeing his condition, Lord Brahma felt great pity on him. 65॥
 
इत्यार्षे श्रीमद्रामायणे वाल्मीकीये आदिकाव्ये उत्तरकाण्डे पञ्चत्रिंश: सर्ग: ॥ ३ ५॥
इस प्रकार श्रीवाल्मीकिनिर्मित आर्षरामायण आदिकाव्यके उत्तरकाण्डमें पैंतीसवाँ सर्ग पूरा हुआ ॥ ३ ५॥
 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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