श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना  »  श्लोक 52
 
 
श्लोक  7.35.52 
नि:स्वाध्यायवषट्कारं निष्क्रियं धर्मवर्जितम्।
वायुप्रकोपात् त्रैलोक्यं निरयस्थमिवाभवत्॥ ५२॥
 
 
अनुवाद
तीनों लोकों में कहीं भी वेदों का स्वाध्याय या यज्ञ नहीं हुआ । समस्त धार्मिक क्रियाएँ बंद हो गईं । त्रिभुवन के प्राणी नरक में गिरकर दुःख भोगने लगे ॥52॥
 
Nowhere in the three worlds was there any self-study of the Vedas or any Yagya. All religious activities stopped. The creatures of Tribhuvan started suffering as if they had fallen into hell. 52॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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