श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना  »  श्लोक 5
 
 
श्लोक  7.35.5 
धर्षयित्वा पुरीं लङ्कां रावणान्त:पुरं तदा।
दृष्टा सम्भाषिता चापि सीता ह्याश्वासिता तथा॥ ५॥
 
 
अनुवाद
फिर लंकापुरी के दिव्य रूप को परास्त करके वे रावण के अन्तःकक्ष में गए, सीता से मिले, उनसे बातचीत की और उन्हें प्रोत्साहित किया॥5॥
 
‘Then after defeating the divine form of Lankapuri, He went to Ravana's inner chamber, met Sita, talked to her and encouraged her.॥ 5॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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