श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  7.35.47 
ततो गिरौ पपातैष इन्द्रवज्राभिताडित:।
पतमानस्य चैतस्य वामा हनुरभज्यत॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
इन्द्र के वज्र से आहत होकर वह एक पर्वत पर गिर पड़ा। वहाँ गिरते समय उसकी बायीं ठोड़ी टूट गई॥47॥
 
‘After being struck by Indra's thunderbolt he fell on a mountain. While falling there his left chin got broken.॥ 47॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd