श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना  »  श्लोक 44
 
 
श्लोक  7.35.44 
ऐरावतं ततो दृष्ट्वा महत्तदिदमित्यपि।
फलं तं हस्तिराजानमभिदुद्राव मारुति:॥ ४४॥
 
 
अनुवाद
'तब उसने ऐरावत को देखकर उसे एक विशाल फल समझ लिया और हाथी को पकड़ने के लिए उसकी ओर दौड़ा।
 
‘Then seeing Airavat he mistook him for a huge fruit and ran towards him to catch the elephant.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by acd