श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना  »  श्लोक 39
 
 
श्लोक  7.35.39 
अथातिरभसेनागाद् राहुरुत्सृज्य वासवम्।
अनेन च स वै दृष्ट: प्रधावन् शैलकूटवत्॥ ३९॥
 
 
अनुवाद
इधर राहु इंद्र को छोड़कर बड़े वेग से आगे बढ़ रहा था, उसी समय हनुमान जी ने राहु को पर्वत शिखर की भाँति दौड़ते हुए देखा।
 
Here Rahu left Indra and moved ahead with great speed. At the same time Hanuman Ji saw Rahu running like a mountain peak.
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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