श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना  »  श्लोक 32
 
 
श्लोक  7.35.32 
अनेन च परामृष्टो राहु: सूर्यरथोपरि।
अपक्रान्तस्ततस्त्रस्तो राहुश्चन्द्रार्कमर्दन:॥ ३२॥
 
 
अनुवाद
जब हनुमानजी ने सूर्य के रथ के ऊपरी भाग पर राहु का स्पर्श किया, तब सूर्य और चन्द्रमा को कुचलने वाला राहु भयभीत होकर वहाँ से भाग गया ॥32॥
 
When Hanuman touched Rahu on the upper part of the Sun's chariot, Rahu, who crushes the Sun and the Moon, became frightened and ran away from there. ॥ 32॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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