श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना  »  श्लोक 30
 
 
श्लोक  7.35.30 
शिशुरेष त्वदोषज्ञ इति मत्वा दिवाकर:।
कार्यं चास्मिन् समायत्तमित्येवं न ददाह स:॥ ३०॥
 
 
अनुवाद
सूर्यदेव ने यह सोचकर कि वह अभी बालक है, गुण-दोषों को नहीं जानता तथा देवताओं के भविष्य के बहुत से कार्य उसके अधीन हैं, उसे नहीं जलाया॥30॥
 
The Sun God, thinking that he is still a child, does not know the virtues and faults and a lot of future work of the gods is under his control, did not burn him.॥ 30॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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