श्रीमद् वाल्मीकि रामायण  »  काण्ड 7: उत्तर काण्ड  »  सर्ग 35: हनुमान्जी की उत्पत्ति, शैशवावस्था में इनका सूर्य, राहु और ऐरावत पर आक्रमण, इन्द्र के वज्र से इनकी मूर्च्छा, वायु के कोप से संसार के प्राणियों को कष्ट और उन्हें प्रसन्न करने के लिये देवताओं सहित ब्रह्माजी का उनके पास जाना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  7.35.3 
शौर्यं दाक्ष्यं बलं धैर्यं प्राज्ञता नयसाधनम्।
विक्रमश्च प्रभावश्च हनूमति कृतालया:॥ ३॥
 
 
अनुवाद
'साहस, कौशल, बल, धैर्य, बुद्धि, नीति, पराक्रम और प्रभाव - ये सभी गुण हनुमानजी में निवास करते हैं।॥3॥
 
‘Courage, skill, strength, patience, wisdom, policy, valour and influence - all these virtues have found a home in Hanumanji.॥ 3॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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